टीकाकरण के बारे में जानने लायक कुछ बातें

प्रमोद जोशी

मनुष्य का अस्तित्व कायम रहा है तो इसकी बड़ी वजह उसकी विवेकशीलता है। दुनिया के सभी प्राणियों में वह अकेला विवेकशील प्राणी है। उसने अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए लड़ना, समझना और खुद को बदलना सीखा है। अस्तित्व रक्षा की यह लड़ाई कई तरह की ऐसी बीमारियों से भी है, जो दूसरे जीवधारियों के कारण पैदा होती हैं। इन जीवधारियों को रोगाणु (Pathogen) कहते हैं। ये रोगाणु वायरस,बैक्टीरिया (Bacteria), कवक(Fungus) या प्रजीवाणु (Protozoa) कई प्रकार के होते हैं। इनके संक्रमण से कई तरह के रोग पैदा होते हैं।

प्रकृति ने हमारे शरीर को प्रतिरक्षा का गुण भी दिया है। हमारे खून में लाल और सफेद कोष (Cells) होते हैं। सफेद कोष का एक रूप लिम्फोसाइट्स कहलाता है। लिम्फोसाइट हमारे शरीर की रक्षा करने वाले सैनिक हैं। ये हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। टीकाकरण रोग का इलाज नहीं करता, बल्कि शरीर की प्रतिरक्षण क्षमता बढ़ाता है।टीका या वैक्सीन दो तरह से काम करता है.

  • टीकाकरण के बाद हमारे शरीर के लिम्फोसाइट उन रोगाणुओं से परिचित हो जाते हैं, जो हानिकारक हैं। इससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
  • टीकाकरण के बाद रोग-ग्रस्त लोगों की संख्या कम होती जाती है। इससे समूह-प्रतिरक्षण (Herd immunity) का विकास होता है और रोग का प्रसार रुक जाता है। बड़े स्तर पर टीकाकरण के कारण दुनिया के काफी बड़े हिस्से से पोलियो जैसी बीमारी खत्म हो गई है। भारत में सन 2014 में पोलियो की समाप्ति को प्रमाणित किया गया।

टीकाकरण शरीर के प्रतिरक्षण तंत्र को कुछ खास रोगाणुओं की पहचान करने लायक बनाता, ताकि उनके संक्रमण को रोका जा सके या उसके असर को कम किया जा सके। पर टीके सभी तरह के वायरस, बैक्टीरिया या प्रोटोज़ोआ के खिलाफ प्रभावशाली नहीं हैं। विज्ञान की इस शाखा का विस्तार हो ही रहा है। वैक्सीन या टीका इंजेक्शन, ड्रॉप या गोली के रूप में हो सकता है।

भारत में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम

भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) गुणवत्तापूर्ण वैक्सीन का उपयोग करने, लाभार्थियों की संख्या, टीकाकरण सत्रों के आयोजन और भौगोलिक प्रसार एवं क्षेत्रों की विविधता को कवर करने के संदर्भ में विश्व का सबसे बड़ा अभियान है।राष्ट्रीय टीकाकरण नीति को वर्ष 1978 में अपनाया गया था। इसकी शुरुआत टीकाकरण के विस्तारित कार्यक्रम (ईपीआई) से हुई थी, जिसके तहत प्रारंभिक अवस्था के अस्सी प्रतिशत टीकाकरण कवरेज को बढ़ावा दिया जाना था। सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) का शुभारंभ चरणबद्ध तरीके से 1985 में शुरू किया गया। इस कार्यक्रम के तहत वर्ष 1985 में खसरे के टीके और वर्ष 1990 में विटामिन-ए के पूरकता कार्यक्रम को जोड़ा गया।

सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के तहत 7 जानलेवा बीमारियों के टीके लगाए जाते हैं। इन बीमारियों में-तपेदिक (Tuberculosis), पोलियो (Poliomyelitis), हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis B), डिप्थीरिया (Diphtheria), काली खांसी (Pertussis), टेटनस (Tetanus) और खसरा (Measles) शामिल हैं। कुछ राज्यों और जि़लों में हीमोफिलस इनफ्लुएंज़ा टाइप बी (HaemophilusInfluenzae type B) और जापानी इन्सेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) के भी टीके लगाए जाते हैं।शिशु को खसरे के टीके के साथ विटामिन ए ड्रॉप्‍स भी ली जाती है।  2002-2003 से देश के कुछ चुने हुए शहरों में हेपेटाइटिस बी के टीके को भी इस कार्यक्रम में शामिल कर लिया गया है।

भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी बच्चों को टीकाकरण के अंतर्गत लाने के लिए25दिसंबर 2014को सुशासन दिवस के अवसर पर ‘मिशन इंद्रधनुष’ शुरू किया । इंद्रधनुष के सात रंगों को प्रदर्शित करने वालेइस मिशन का उद्देश्य देश के सभी बच्चों को 2020 तक टीकाकरण के दायरे में लाना है। पहले चरण में देश में 201 जिलों की पहचान की गई, जिनमें 50 प्रतिशत तक बच्चों को टीके नहीं लगे थे या उन्हें आंशिक रूप से टीके लगाए गए थे।

शिशु-टीकाकरण

टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार अस्पताल या किसी संस्थान में जन्‍म लेने वाले सभी शिशुओं को जन्‍म लेते ही या अस्पताल छोड़ने से पहले बीसीजी का टीका, पोलियो की जीरो खुराक और हेपेटाइटिस बी का टीका लगा दिया जाना चाहिए। अस्पताल या संस्थान में जन्‍म लेने वाले शिशुओं को डीटीपी का पहला टीका, पोलियो की पहली खुराक, हेपेटाइटिस बी का पहला टीका और बीसीजी का टीका डेढ माह (6सप्ताह) का होने पर दिया जाता है। ढाई महीने (10सप्ताह) का होने पर शिशु को डीपीटी का दूसरा टीका, पोलियो की दूसरी खुराक और हेपेटाइटिस बी का टीका देना जरूरी है।

साढ़े तीन महीने (14सप्ताह)  का होने पर डीपीटी का तीसरा टीका, पोलियो की तीसरी खुराक और हेपेटाइटिस बी का तीसरा टीका देना जरूरी है। अन्त में नौवें महीने (270दिन) के तुरन्त बाद और एक वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले शिशु सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए हर हालत में खसरे का टीका लगवाना चाहिए। खसरे के टीके के साथ-साथ विटामिन ए की पहली खुराक भी दी जानी चाहिए। विटामिन ए की दूसरी खुराक 16 - 24 महीने का होने पर दी जानी चाहिए। विटामिन ए की बाकी तीन खुराकें तीन साल 6 महीने के अन्‍तराल पर दी जानी चाहिए। बच्चे को विटामिन ए की कुल पाँच खुराकें दी जानी चाहिए।

खसरा-रूबेला टीका

खसरा का टीका हमारे सार्वभौमिक टीकाकरण का हिस्सा है। गत 5 फरवरी को केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री नेबेंगलुरु में हुए एक समारोह मे खसरा-रूबेला संयुक्त टीका लांच किया है। खसरा-रूबेला (MR) टीके के पहले चरण की शुरुआत पाँच राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों कर्नाटक, पुदुच्चेरी, तमिलनाडु, गोवा तथा लक्षदीप से हो रही है। यह संयुक्त टीका वर्तमान मे खसरा हेतु दी जाने वाली दो खुराकों को जो 9-12 माह तथा 16-24 माह पर बच्चों को दी जाती हैं एकल खुराक से प्रतिस्थापित करेगा| इसकी मात्र एक खुराक 9-15 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को एक बार दी जाएगी, भले ही पहले उन्होंने खसरा/रूबेला का टीका लिया हो या नहीं|
इस अभियान के अंतर्गत पूरे देश मे 41 करोड़ बच्चों को सम्मिलित किया जाएगा, जो किसी भी अभियान का अब तक का सबसे बड़ा लक्ष्य है|रूबेला को ‘जर्मन खसरा’ भी कहते हैं | यह एक संक्रामक रोग है जो रूबेला वायरस के कारण होता है| बच्चों मे बुखार, सिरदर्द, फैलने वाले चकत्ते और कान के पीछे या गर्दन की लासिका ग्रंथियों मे वृद्धि जैसे लक्षण पाए जाते हैं| गर्भवती महिलाओं मे रूबेला संक्रमण भ्रूण की मृत्यु या जन्मजात विकारों के कारण बन सकता है।

गर्भवती महिलाओं के लिए टीके

गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान जल्दी से जल्दी टिटनेस टॉक्‍साइड(टीटी) के  दो टीके लगाये जाने चाहिए। इन टीकों को टीटी1 और टीटी2 कहा जाता है। इन दोनों टीकों के बीच चार सप्ताह का अन्तर रखना आवश्यक है। यदि गर्भवती महिला पिछले तीन वर्ष में टीटी के दो टीके लगवा चुकी है तो उसे इस गर्भावस्था के दौरान केवल बूस्टर टीटी टीका ही लगवाना चाहिए।
यदि गर्भवती महिला गर्भावस्था के दौरान देर से अपना नाम दर्ज कराए तब भी टीटी के टीके लगाए जाने चाहिए। टीटी का टीका माँ ओर बच्चे को टिटनेस की बीमारी से बचाता है। भारत में नवजात शिशुओं की मौत का एक प्रमुख कारण जन्‍म के समय टिटनेस का संक्रमण होना है। इसलिए अगर गर्भवती महिला टीकाकरण के लिए देर से भी नाम दर्ज कराए तब भी उसे टीटी के टीके लगाए जाने चाहिए। किन्तु टीटी2 (या बूस्टर) टीका प्रसव की अनुमानित तारीख से कम से कम चार सप्ताह पहले दिया जाना चाहिए। ताकि उसे उसका पूरा लाभ मिल सके।

बढ़ते कदम

सामान्यतः ग्रामीण बच्चों के टीकाकरण का चक्र अधूरा रह जाने का अंदेशा ज्यादा होता है। यह खामी सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश में उजागर हुई है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असमानता केरल में देखने को मिली है। इसके बाद छत्तीसगढ़ और हरियाणा का स्थान है। 

हर साल देश में सामान्य टीकाकरण के नौ करोड़ सत्र होते हैं। इनमें 2.6 करोड़ बच्चों और तीन करोड़ गर्भवती माताओं को कवर किया जाता है। इस काम को पूरा करने के लिए 27,000 कोल्ड चेन स्टोर की मदद ली जाती है। भारत में पूर्ण टीकाकरण की दिशा में राष्ट्रीय औसत 61 फीसदी है और डीपीटी-3 की कवरेज 72 प्रतिशत है। देश में जिन जिलों में डीपीटी-3 के मामले में कवरेज 80 फीसदी से कम है, उनकी संख्या कुल 601 में से 403 है। यानी 67 फीसदी जिलों में अभी कवरेज 80 फीसदी से कम है। भारत में उन बच्चों की संख्या सबसे बड़ी है, जिनका डीपीटी-3 के तहत टीकाकरण नहीं हुआ है। यह संख्या है 74 लाख।

हरेक राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस पर 17.2 करोड़ बच्चों को पोलियो का टीका दिया जाता है। भारत के पोलियो टीकाकरण अभियान के अंतर्गत हर साल 80 करोड़ बच्चों का पोलियो टीकाकरण होता है। देश के 13.5 करोड़ बच्चों को खसरे का दूसरा टीका सुनिश्चित करने के लिए तीन वर्षीय अभियान चलाया गया, जिसके तहत अकेले 2012-13 में सात करोड़ बच्चों को कवर किया गया। सन 2012-13 में चलाए गए एक विशेष अभियान के तहत एक करोड़ 53 लाख 50 हजार टीकों की खुराकें उन बच्चों को दी गईं, जिनकी खुराकें छूट गईं थीं।

प्रमोद जोशी

पोलियो एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज संभव नही है।

RAJENDRA SINGH

विश्व स्वास्थ संगठन के सतत प्रयासों से दुनिया के कई देश पोलियो मुक्त हो चुके हैं जिनमें भारत का नाम भी शामिल है। आजादी क बाद भारत में भूखमरी गरीबी आवास आदि समस्याएं तो थी ही साथ ही पोलियो नामक बीमारि भी भारत में मुंह बाए खड़ी थी जिसका यदि समय से उपचार ना किया जाए तो पीढ़ियों तक इस रोग का दंश झेलना पड़ता है। पोलियो एक ऐसी बीमारी है जिसमें रोगी का शरीर लकवा ग्रस्त हो जाता है और नौनिहाल विकलांग हो जाते हैं। शरीर का एक हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है जिससे रोगी को अपनी आमदिनचर्या के कामों पर भी दूसरे लोगों पर निर्भर होना पड़ता है।

विश्व स्वास्थ संगठन की मानें तो भारत अब पोलियो मुक्त राष्ट्र बन चुका है। यहां यह बताना जरुरी है कि WHO किसी भी देश को पूर्ण पोलियो मुक्त राष्ट्र तब घोषित करता है जब उस देश में लगातार तीन साल तक पोलियो के एक भी मामले सामने नही आते हैं।

भारत ने इस कामयाबी को हासिल करने क लिए लगभग 18 साल तक सतत प्रयास किया है । तब जाकर भारत एक पोलियो मुक्त राष्ट्र बना है। आगे आने वाले समय में  पोलियो का एक भी केस न हो इसलिए पोलियो के संभावित खतरे को ध्यान मे रकते हुए 2017 में भारत सरकार की ओर से एक बार फिर पल्स पोलियो अभियान का आरंभ किया गया। 2017 में राष्ट्रीय प्रतिरक्षा दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी व स्वास्थ मंत्री जेपी नड्डा ने इस अभियान की शुरुआत की।

इस अभियान मे देश से पोलियो के जड़ से खात्‍मे के लिए शुरू हुए अभियान में पांच वर्ष से कम आयु के लगभग 17 करोड़ बच्चों को पोलियो खुराक पिलाई जाएगी. इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री जे.पी.नड्डा ने कहा कि 27 मार्च, 2014 को भारत समेत विश्व स्वास्थ्य संगठन के समस्त दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र का पोलियो मुक्त प्रमाणीकरण जन्म स्वास्थ्य के इतिहास में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है

   

पोलियो टीकाकरण अभियान किसी एक बीमारी के खिलाफ चले अबतक के सबसे बड़े और लंबे अभियानों में से एक रहा है| ‘दो बूंद जिंदगी की’ का नारा इतना सफल रहा, जिसकी शायद आरंभ में कल्पना भी नहीं थी| संयुक्त राष्ट्र ने 1988 में विश्व को पोलियो मुक्त करने का अभियान आरंभ किया था| भारत में दिल्ली सरकार में 1993 से 1998 तक स्वास्थ्य मंत्री रहने के दौरान डॉ हर्षवर्धन ने दिल्ली में पल्स पोलियो कार्यक्रम की शुरुआत की थी| यह 1995 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना में शामिल होकर देशव्यापी अभियान में परिणत हुआ|

भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और रोटरी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने इनमें अहम भूमिकाएं निभायीं| इसके अलावा अनेक नेता,मंत्री, कलाकार, खिलाड़ी, नामचीन लोगों ने इसका प्रचार किया| इस दौरान ‘दो बूंद जिंदगी की’ वाकई एक मुहावरे की तरह सबकी जुबान पर रहता था| स्थानीय स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने भी इसमें भूमिका निभायीं और सामाजिक संगठनों ने भी| यदि पूरा देश इसमें एक होकर नहीं लगता, तो हम आज इस स्थिति में नहीं पहुंचते|

उत्तर प्रदेश और बिहार देश के दो ऐसे राज्य रहे हैं जहां कभी पोलियो के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। 2010 तक इन राज्यों में पोलियो के ग्रआफ में तेजी से गिरावट आई और धीरे धीरे यहां से भी पोलियो विलुप्त हो गया।

  बेशक आज भारत पोलियो मुक्त राष्ट्र बन चुका है लेकिन जब तक विश्व के किसी भी कोने में पोलियो के वायरस मौजूद रहेगे ये ये संकट टलेगा नही। गौरतलब है कि भारत के पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान और अफगानिस्तान आज भी पोलियो मुक्त नही हो पाए हैं. ऐसे में भारत में एक बार फिर पोलियो अपना गढ़ बना सकता है।

    आज के समय में यदि कम समय में अधिकतम लोगों तक ज्यादा से ज्यादा जानकारी पंहुचानी हो तो रेडियो और टेलीविजन अच्छा माध्यम है। अमिताभ की दमदार आवाज में दो बूंद जिंदगी का एड कौन भूल सकता है। शाहरुख खान और कई बड़ी हस्तियां भी इस अभियान में हाथ बंटा चुकी है। ऐसे में रेडियो और टीवी पर हस्तियों के साथ जागरुकता अभियान काफी सार्थक हो सकता है।

सोशल मीडिया पर भी पोलियो से संबंधित जानकारियों का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करना चाहिए ताकि कई पीढ़ियां इस बीमारी से दूर रह सकें। गांवो औऱ शहरों दोनो पर स्वास्थ संगठनो को बराबर ध्यान दोना चाहिए । देखा गया है कि शहरों की तुलना में गांवों में लोग इस बीमारी को लेकतर कम जागरुक हैं। पोलियो ड्रॉप्स की सुनिश्चित किया जाना नितांत आवश्यक है।

इन सबके साथ ये भी जरुरी है कि समय समय पर यह जरुर जांचा जाए की पोलियो के वायरस तो सक्रिय रुप से हमारे आस पास के वातावरण में नही है।

RAJENDRA SINGH

रेडियो बन सकता है टीकाकरण का सशक्त संचार माध्यम

ज्ञानेंद्र पाण्डेय

रेडियो बन सकता है टीकाकरण का सशक्त संचार माध्यम ण्ण्ण्ण्ण्ण् जनहित के किये किये जाने वाले किसी भी महाभियान को प्रभावशाली तरीके से आम जन तक पहुँचाने के मकसद से रेडियो एक सशक्त माध्यम बन सकता है ण् आम जन तक सर्वाधिक पहुँच बनाने वाले इस माध्यम ने अतीत में भी जन जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है ण् बहुत समय पामे पहले आकाशवाणी के कृषि दर्शन कार्यक्रम ने अपनी धूम मचा राखी थी ण् किसानो की समस्याओं का समाधान करने के साथ ही खराब मौसम एखेती को नुक्सान पहुँचाने वाली बीमारियों ए प्राकृतिक विपदा तथा दूसरी तमाम तरह की परेशानियों से बचाव के कार्यक्रम काफी लोक प्रिय हुआ करते थे ण् यही नहीं रेडियो सीलोन से प्रसारित होने  वाले बिनाका गीतमाला कार्यक्रम से तो अमीन सायानी  का पूरी दुनिया में ही नाम हो गया था आज भी लोग अमीन सायानी कि आवाज़ को याद करते हैं 

ण्हिंदी के समाचार वाचकों में देवकी नंदन पाण्डेय   कि बुलंद आवाज़ आज भी लोगों को याद है ण्ऐसे एक नहीं अनेक रेडियो प्रोग्राम हैं जो जनता के मन को छू लेने की मिसाल बन गए हैं ण्आकाशवाणी ए ऍफ़ एम्रडियो समेत तमाम ऐसे रेडियो स्टेशन हैं जो टीकाकरण को भी बुलंदियों के शिखर तक पहुंचा सकते हैं जरूरत इतनी ही है कि रेडियो में प्रोग्राम ऐसे बने जो लोगों को बड़ी तादाद में टीकाकरण स्थल तक पहुंचाएं ण्ण्कैसे हों रेडियो के ये प्रोग्राम इस बारे में भी विस्तार से चर्चा करने की जरूरत है

दो से तीन मिनट की अवधि के छोटे . छोटे प्रोग्राम सुनने वाले को बोर भी नहीं करेंगे और  जनता तक टीकाकरण के फायदे भी पहुंचा देंगे ण्बचपन में सुना करते थे कि सरकार परिवार नियोजन से लेकर मलेरिया जैसे रोग के बचाव के लिए कुछ ऐसे प्रोग्राम रेडियो के माध्यम से प्रसारित करवाती थी और इनका प्रभाव भी हुआ करता था ण् इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए टीकाकरण के सन्दर्भ में भी नए सिरे से रेडियो प्रोग्राम बनाने और उनका प्रसारण करने की आज सबसे बड़ी जरूरत है ण्रेडियो के इन कार्यक्रमों को अलग . अलग शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है  मसलन  क्या है टीकाकरण ए क्यों जरूरी है टीकाकरण ए किस तरह के रोगों की रोकथाम के लिए किया जाता है टीकाकरण एक्या हैं टीकाकरण के फायदे और क्या होती है वेक्सीन ए अलग . अलग रोगों के लिए क्या अलग होती है वेक्सीन ए दुनिया के देशों में कैसे होता है टीकाकरण ए वैश्विक धरातल में क्या है भारत की स्थिति ए हर साल कितने लोग मर जाते हैं टीकाकरण न करने के कारण और कहाँ करा सकते हैं 

टीकाकरण जैसे कुछ विषयों पर प्रोग्राम बना कर रेडियो के माध्यम से प्रसारित किया जा सकता है ण्इनका असर व्यापक रूप से पड़ेगा और टीकाकरण अभियान को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता ण्जनहित के साथ ही राष्ट्रहित में भी इससे बड़ा कोई और काम नहीं हो सकता ण्पर ये कार्यक्रम रोचक हों जो सीधे इंसान को टीकाकरण के लिए प्रेरित कर सकें

टीकाकरणए जन स्वास्थ्य और संचार माध्यम ण्ण्ण्ण्ण्ण्कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है और जब मन स्वस्थ होता है तभी इंसान कुछ कर भी पाता है  इसलिए कुछ भी करने के लिए शरीर  का स्वस्थ होना नितांत जरूरी है ण् शरीर तभी स्वस्थ रागेगा जब रोग मुक्त हो और रोग मुक्त होने के लिए जरूरी है कि रोग होने से पहले ही उपचार कर लिया जाए ण्कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जो बचपन में ही व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और समय रहते उपचार न करने पर  ला इलाज हो जाते हैं बड़े होने पर ये रोग जानलेवा भी हो जाते हैं 

पोलियो समेत ऐसे कई रोग हैं जो बचपन से ही मनुष्य को अपनी लपेट में ले लेते हैं और मरते दम ताम तक इंसान को परेशान करते रहते हैं ण्ऐसे रोग जिनका पता नहीं चल पाता  उनका भी इलाज होता है और ये इलाज एहतियात के तौर पर ही किया जाता है ए एहतियाती इलाज को ही टीकाकरण कहा जाता है और यह टीकाकरण बचपन में ही कर लिया जाता है ताकि रोग के पनपने की संभावना  ही न रहे और बछा बड़ा होकर भी स्वस्थ बना रहे ए लेकिन अशिक्षा और अभाव के चलते देश की एक बड़ी आबादी  टीकाकरण न करवाने के चलते पोलियो जैसे रोगों का शिकार हो जाती है ण्इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि लोग जागरूक नहीं हैं और संचार माध्यम समय पर उनको जागरूक नहीं कर पाते या फिर  वो सरकार तथा अंतर राष्ट्रीय संगठनों द्वारा चलाये जा रहे टीकाकरण अभियान का हिस्सा नहीं बन पाते ण् यूनिसेफ जैसी संस्था इस दिशा में सराहनीय काम कर रही है और इस अभियान से जुड़े संचार माध्यमों की बदोलत अब बड़ी संख्या में लोग टीकाकरण अभियान से जुड़ भी रहे हैं ण्पर देश की आबादी के घनत्व को देखते हुए संचार माध्यमो की भूमिका को उतना सराहनीय नहीं कहा जा सकता जिस अनुपात में यूनिसेफ का अभियान विस्तार फलक से जुड़ गया है

उनिसेफ़ ने तो रेडियो जैसे सशक्त जन संचार माध्यम को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया लेकिन सरकारी और निजी क्षेत्र के कुछ अपवाद रेडियो पत्रकारों के अलावा शेष लोगों की प्राथमिकता शायद कुछ और ही है इसलिए स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों का रेडियो तंत्र में अभाव ही दिखाई देता है ण्जन स्वास्थ्य और टीकाकरण जैसे कार्यक्रमों की अनदेखी करना एक खतरे का संकेत देता है क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही से इन जन्मजात रोगों से असमय मौत का शिकार होने वाले लोगों का आंकड़ा खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है  इन रोगों से साल भर में कितने लोग मरते होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले टीकाकरण अभियान से ही हर साल दुनिया में औसतन दो से तीन मिलियन यानी बीस से लेकर तीस लाख लोगों को टीकाकरण के जरिये इस रोग से बचाया गया है भारत में टीकाकरण की स्थिति संतोषजनक ही नहीं बलि दुनिया में सबसे बेहतर मानी जाती है ण् भारत  में  यूनिसेफ के टीकाकरण अभियान को  विश्व सबसे बड़ा अभियान बताया गया है 

अभियान के बृहद आकार को देखते हुए ही यहाँ प्रत्येक वर्ष  सताईस मिलियन यानी दो करोड़ सत्तर लाख नवजात शिशुओं को टीकाकरण अभियान से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है और इस लक्ष्य को शत प्रतिशत हासिल करने के प्रयास भी जारी हैं इस लक्ष्य को हासिल करने की गरज से ही भारत में हर साल  नब्बे लाख टीकाकरण सत्रों का आयोजन भी किया जा रहा है और इसके सार्थक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं भारत सरकार के टीकाकरण अभियान इन्द्रधनुष के तहत देश को रोग मुक्त करने की एक अच्छी पहल शुरू की गई है लेकिन दुःख की बात ये है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक भारत के पैंसठ प्रतिशत बच्चों का ही टीकाकरण हो सका है ण् साफ़ है कि देश के पैंतीस प्रतिशत बच्चे इस सुविधा से वंचित हैं ण्देश की आबादी का यह हिस्सा बहुत बड़ा है और इन सब का टीकाकरण किसी चुनौती से कम भी नहीं है सवाल ये है कि सरकार और यूनिसेफ जिस लगन से इस अभियान को आगे बड़ा रहे हैं एउसे सफल बनाने में और क्या करना बाकी है ण् ये तो थी अब तक पैदा हुए बच्चों के टीकाकरण करने और रोगमुक्त करने की बात इसी सन्दर्भ में हर रोज़ और पैदा होने वाले बच्चों के टीकाकरण की बात भी  करें तो अभियान की व्यापकता का अहसास हो सकता है ण्काम कोई भी हो असंभव जरूर हो सकता है लेकिन हिम्मत और लगन से असंभव से असंभव काम को भी आसानी से किया जा सकता है ण् काम तो लोग ए संस्थाएं और सरकार कर ही रहे हैं जरूरत सिर्फ इतनी सी है कि रेडियो जैसे संचार माध्यम इसका इमाम्दार हिस्सा बने और ऐसे लोगों को इससे जोड़ने का माध्यम बने जो अब तक इस अभियान से जुड़ नहीं सके हैं हैं

 रेडियो को जन संचार माध्यमों में जनता से सबसे का करीब का माध्यम भी माना जाता है और अब तो जब से मोबाइल में रेडियो आ गया है इसकी पाहून और बढ़ गई है जो लोग पढ़ नहीं सकते वो भी रेडियो कार्यक्रमों के जरिये जागरूक बन सकते हैं ण् सवाल ये भी है कि लोगों को जागरूक करने के लिए रेडियो में किस तरह के प्रोग्राम बनाए जाएँ जो  रोचक भी हों और जागरूक बनाने का काम भी करें ण् ये प्रोग्राम बड़े भी नहीं होने चाहिए और उबाऊ भी न हों तभी लोग इन्हें रेडियो पर सुनना पसंद भी करेंगे और जब लोग रेडियो प्रोग्राम के जरिये टीकाकरण अभियान की जानकारी पायेंगे तो निश्चित ही इसससे  जुड़ना भी पसंद करेंगे ण् जब बड़ी तादाद में लोग रेडियो प्रोग्राम से जुड़ेंगे तो इस अभियान को अंजाम तक पहुँचाने में भी कामयाबी मिलेगी

ज्ञानेंद्र पाण्डेय
 सहायक संपादक  लोकसभा टेलीविज़न



Stunted Children lead to Stunted Nations

(26/5/2016) Media can boost growth of both by Neelam jain

Did you know nearly half of India’s under-five children are stunted? In absolute numbers, it is a staggering 54 million children – the total population of Canada and Netherlands put together. According to UNICEF’s Stop Stunting in South Asia, there is a global child stunting crisis and South Asia is the epicenter, bearing 40 per cent of the global burden of stunting. India has seized 33 per cent of global share. Stunting causes physical and neurocognitive damage that is most often irreversible..According to the report nearly 64 million children in South Asia have stunted growth due to chronic nutritional deprivation. Alarming? Undoubtedly. Yet, there is good news too: The problem has a solution. And media can play a significant role towards the solution.

“Media are the connectors between policy and people,” said Philippe Cori, UNICEF Deputy Regional Director at the unveiling of Stop Stunting in South Asia, a special issue of the international journal Maternal and Child Nutrition. “Media can create norms. It translates the message for communities and knows best how to reach the target audience.” Since most stunting happens in the first 1000 days - from conception to age two years, when children’s linear growth is most sensitive to nutrition deprivation and environmental stress, the role of breast feeding cannot be over-emphasized. Illustrating media’s role in propagating the message, Cory said, “When a rural, unlettered woman, working as a farm-hand constantly listens to radio messages exhorting the virtues of breast-feeding her infant, she is bound to be influenced.” “Or, when media portrays visuals of shrunken brain of a stunted child, it can galvanize the community into action.”

Stunting is defined as inadequate length/height for age. It is the most prevalent form of under-nutrition, yet it goes largely unrecognized. It is the cause of world’s one million child deaths annually. “South Asian nations must invest in large-scale programmes along with equity-focused social and economic policies for the prevention of stunting,” said Karin Hulshof, UNICEF Regional Director for South Asia. Investments in this region, and in these issues, are critical if the world is to achieve the global target of reducing by 40% the number of children under five who are stunted, from 171 million in 2010 to about 100 million in 2025 (WHO 2015).

Stop Stunting in South Asia focuses on three major drivers of child stunting in the region: poor diets of children in the first two years of life; poor nutrition of women before and during pregnancy; and poor sanitation practices in households and communities. Water, sanitation and hygiene (WASH) complements stunting and nutrition, the study said.

Interestingly, as much as 50 per cent of malnutrition is caused not by a lack of food or poor diets, but due to poor water, poor sanitation facilities and unhygienic practices – like not washing hands properly with soap – which leads to life-threatening disease and infections such as diarrhea. UNICEF is currently conducting WASH program with much rigour in India. “As well as strengthening the nutritional intake of mothers, newborns and infants, UNICEF focuses on improving poor sanitation and hygiene to improve their health and chances of survival,” Cory told CMRT. “Media can enhance the visibility of this campaign through sustained messaging.”

Now some good news. Over the last two decades, the prevalence of stunting in South Asia declined from 61 percent to 38 percent. “The challenge ahead is to accelerate progress so that South Asia delivers its share of the global target to reduce child stunting,” said Dr. Victor Aguayo, UNICEF Regional Nutrition Advisor for South Asia. Studies estimate that every US$ 1 invested in nutrition generates US$18 in economic returns. Large declines in child stunting can be achieved with political will and evidence-based interventions.

Among nations world wide, Peru’s recent phenomenal success in bringing down its stunting rate by 50% has given hope to the world community. In 2000, one in three Peruvian children under 5-years- old suffered from chronic malnutrition. Since 2007 stunting fell by half. Nearly half a million children under 5-years- old have escaped chronic malnutrition and are off to a brighter start in their lives. The country owed its success to an initiative that lobbied political candidates to sign commitment to reduce stunting in children and to lessen inequities between urban and rural areas. Sustained media campaign played a key role in the country’s success story.

“Indians are interested in knowledge, academic degrees and overall success in life. Nutrition has a big role to play in this aspirational life style,” said Aguayo. Even among survivors, stunting in infancy and early childhood causes lasting damage, including increased morbidity, poor cognition and educational performance in childhood, short stature in adulthood, and reduced earnings in adults. Therefore, it is accurate to say that stunting hampers the development of entire societies. Dr, Saba Mebrahtu, Chief, Child Development and Nutrition, UNICEF, said, “By making nutrition aspirational we can bring the value of good nutrition to Indian households.” Mebrahtu also emphasized the role of media in helping improve policies, programmes and behavior change. “It is all about knowledge, and media can do it,” she said.


Youth roll up sleeves for marginalized Unicef’s unseen partners in MDG

(26/6/2016) Media can boost growth of both by Neelam jain

New Delhi, June 2016 - Much like Mani Lal Bhaumik, the US-based physicist of Indian origin credited with inventing the vision correcting Lasik technology and lately in news for gifting an American university US$11 million – the largest ever in the history of that university, young Robin Chaurasiya had her moment of epiphany amidst the plentiful life of the west. Robin’s life at home with her parents had all the trappings of a successful immigrant family, and her career with American air force was set to take off. Yet she felt there was something missing in life.

“Purpose of life is to pursue happiness,” Chaurasiya said in a session held on the sidelines of New Delhi launch of UNICEF’s report on the state of the world’s children. Chaurasiya works among sex workers of Mumbai to “empower girls to become agents of social change.” Her non-governmental organization Kranti has redefined the lives of many a young girl. One such girl Ashwini Mane, born in Kamathipura - Mumbai’s oldest and Asia’s second largest red-light district, summed up evocatively what people like Chaurasiya are doing for them. Mane left home, Kamathipura, at the age of seven and spent the next 10 years either with relatives, NGOs, or hounded by police in various states of the country. When she finally came to Kranti after undergoing untold hardships, someone asked her if she was happy, to which she replied, “I don’t know what happiness means.” Today, Mane has “learnt to define her own happiness.”

The session organized by UNICEF under the umbrella of Youth Ki Awaaz , an online news platform that also positions itself as a campaigning platform for NGOs and social organizations, had similar other youth activists. These young activists, undaunted by bureaucratic hurdles or the inertia associated with governmental policies, carry on innovative work to make a change. They are the real hope of India amidst the bleak future predicted by the UNICEF report.

Despite the number of out-of-school children between 6 to 13 years in India declining from 8 million in 2009 to 6 million in 2014, out of 74 million children of pre-school group of 3-6 years, nearly 20 million were not attending any preschool education. It is the children from the poorest families and marginalised communities who are often left behind, the report pointed.

It is to help children from poor families that Akshay Saxena’s social enterprise Avanti works in many Indian states. Avanti provides low-income high-school students a world-class science and mathematics education. “50 million students in India are getting a terrible higher education,” Saxena, an IIT alumnus, said. “We have the most inequitable education system. Even understanding the problems takes more than a decade.” Avanti aims at addressing the systemic bias which exists against low-income students seeking admission to India’s premier universities.

Activists like Chaurasiya or Saxena do not believe in indulging in arm-chair criticism of the system. They have gone ahead and dirtied their hands. “In the end it is doggedness that gives results,” said Saxena.

These are some of the success stories that are waiting to be told to the world. Avanti’s students are mostly first generation learners and the organization follows innovative approach in that its centers have no trained teachers and there is very little conventional lecturing. Yet many of its students make it to India’s premier engineering institutes. The town of Kupwara in Kashmir is the hotbed of militancy-related violence. It makes the headlines in Indian media at least once every week. Yet the story of 100 children of this war-torn town enrolling for Avanti’s program is not likely to be told.

While media needs to draw attention to the grim state of the world’s children, report on the need to invest in the most disadvantaged, and point the lacunae in the system, it would do well to also highlight the work of such organizations and individuals. Such stories can have a cascading effect in inspiring people to come forward and “be the change they want to see.”



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