टीकों से अब भी दूर लाखों बच्चे

डॉक्टर मुजफ्फर हुसैन गजाली

इमूनाईज़ेशन का व्यापक कार्यक्रम चलाने वाले देशों में भारत एक है। यहां का टीकाकरण कार्यक्रम भौगोलिक क्षेत्र, लाभार्थियों की संख्या और टीके के इस्तेमाल के लिहाज से भी बड़ा है। हर साल लगभग 27 मिलियन नवजात बच्चों को टीका लगाया जाता है। टीके लगाने के लिए 9 मिलियन सत्र वार्षिक होते हैं। भारत टीके बनाने और निर्यात करने में भी आगे है। सभी कोशिशों के बावजूद 65 प्रतिशत बच्चों को ही अपने जीवन के पहले साल में सभी टीके मिल पाते हैं। इस स्थिति को देखते हुए टीकाकरण की मांग पैदा करने के लिए और प्रयास करने की जरूरत है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां टीकाकरण की दर बहुत कम है। सामान्य टीकों को बच्चों तक पहुंचाने में जो कठिनाइयां आ रही हैं उन्हें दूर करना होगा ताकि नियमित टीकाकरण का मार्ग प्रशस्त हो सके। सरकार मिशन इन्द्र धनुष के द्वारा उन बच्चों को टारगेट करने की कोशिश कर रही है जिन तक सामान्य टीकाकरण अभियान द्वारा नहीं पहुंचा जा सका है। उदाहरण के तौर दूरदराज़ क्षेत्र (हार्ड रीच क्षेत्र) कन्स्ट्रक्शन साइट, ईंट के भट्टे, फैक्ट्री और कारखानों आदि में काम कर रही महिलाओं के बच्चे, मिशन इन्द्र धनुष के तहत हर महीने की सात तारीख को सात बीमारियों से बच्चों को बचाने के लिए टीके लगाए जाते है। इस अभियान के लिए 216 जिलों की पहचान की गई, जहां टीकाकरण के दो चरण पूरे हो चुके है और तीसरे चरण के टीके लगाने का काम चल रहा है। मिशन इन्द्र धनुष में सभी बच्चों को टीके लगाए जाने हैं। इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं जिन्हें पूरे टीके नहीं लग सके हैं।

टीकाकरण वायरस और बैक्टीरिया जनित बीमारियों से बचाव का सस्ता और कारगर तरीका है। सरकार की ओर से सभी टीके प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उप स्वास्थ्य और आंगनवाड़ी केन्द्रों पर नि: शुल्क प्रदान किए जाते हैं। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत सभी गर्भवती महिलाओं का बच्चे के जन्म से पहले मुफ्त परीक्षण और देखभाल का इंतजाम किया जाता है। कई राज्यों में स्मार्ट कार्ड के जरिए गर्भवती महिलाओं की निजी अस्पतालों में मुफ्त परीक्षण और उपचार की व्यवस्था भी की गई है। गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पहले और उसके बाद टिटनस का टीका दिया जाता है। इससे जच्चा -बच्चा दोनों टिटनस से सुरक्षित रहते हैं। टिटनस का टीका सामान्य टीकों में शामिल होने से मातृत्व मृत्यु दर में कमी आई है। 30 मिलियन गर्भवती महिलाओं को हर साल टीके देने का टारगेट है।

राष्ट्रीय अनुमान के अनुसार इमूनाईज बच्चों की संख्या 61 प्रतिशत है और डी पी टी-3 का कवरेज 72 प्रतिशत। जिला स्तर पर 80 प्रतिशत से कम डी पी टी-3 कवरेज वाले जिलों की संख्या 601 में से 403 या 67 प्रतिशत यानी दो तिहाई। भारत में ऐसे बच्चों की संख्या भी बहुत अधिक है जिन्हें कोई टीका नहीं लगा है यहां तक ​​कि डी पी टी-3 भी नहीं। ऐसे बच्चे 7.4 मिलियन होने का अनुमान हैं। हमारे देश ने पोलियो से मुक्ति पाने में बड़ी सफलता हासिल की है। प्रत्येक राष्ट्रीय इमूनाईज़ेशन दिवस पर 172 मिलियन बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई। पोलियो टीकाकरण अभियान में हर साल 800 मिलियन बच्चों को कवर किया गया। टीकाकरण अभियान में कोल्ड चेन यानी टीके स्टोर करने वाली जगह की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। वहाँ अलग अलग टीके अलग तापमान पर रखे जाते हैं। कुछ दो से आठ डिग्री पर तो कुछ का तापमान शून्य से नीचे रखना होता है। कोल्ड चेन से निकलने के बाद टीके का उपयोग चार घंटे के बीच करना होता है। तापमान मैन टैन रखने के लिए टीकों को रेफ्रिजरेटीड बॉक्स में रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाया जाता है। देशभर में यह काम 27000 कोल्ड चेन केंद्र रहे हैं और लाखों स्वास्थ्य कार्यकर्ता इस काम में लगे हैं। यह सर्दी, गर्मी, बरसात में बिना रुके पैदल, साइकिल, मोटर साइकिल, कार और नाव से इन दूरदराज के क्षेत्रों तक टीकों को पहुंचाने का काम करते हैं जहां सामान्य परिस्थितियों में भी पहुंचना आसान नहीं है। उनकी कड़ी मेहनत के कारण ही टीकाकरण कार्यक्रम को सफलता मिल रही है।

अभी खसरा रूबेला का टीका लॉन्च हुआ है, जो नो माह से 15 साल तक के सभी बच्चों को चरणबद्ध दिया जाना है।  खसरा का टीका पहले से ही सामान्य टीकाकरण में शामिल है। तीन वर्षीय अभियान में यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि खसरा की दूसरी खुराक जो 16 से 24 महीनों में दी जाती है हर बच्चे को मिल जाए। इसके लिए 135 मिलियन बच्चों को टारगेट किया गया था। इनमें 70 मिलियन वे बच्चे भी शामिल हैं जिन्हें 2012-13 में खसरा की खुराक दी जा चुकी है। कई लोग खसरा रूबेला (एम आर) टीके का विरोध यह कहकर कर रहे हैं कि जब खसरा का टीका पहले से नियमित टीकाकरण में शामिल है तो इस नए टीके की क्या जरूरत है। खसरा रूबेला वायरस से होने वाली बीमारी है। ऐसा देखा गया कि जिन को खसरा का टीका दिया जा चुका था वह भी रूबेला के शिकार हुए। रूबेला के लक्षण भी खसरा की तरह ही होते हैं। नाक से पानी टपकना, बुखार आना, शरीर पर लाल निशान बनना आदि। रूबेला खसरा से ज्यादा खतरनाक है। यदि कोई गर्भवती महिला उस से प्रभावित हो जाए तो पैदा होने वाला बच्चा मानसिक, शारीरिक रूप से कमजोर, अंधा, बहरा या फिर दिल की बीमारी से पीड़ित हो सकता है। एम आर टीका पहले से मौजूद है और डॉक्टर उसे 400 से 900 रुपये में देते हैं। डब्ल्यूएचओ के सदस्य देशों ने इसे नियमित टीकाकरण में शामिल किया है क्योंकि एक भी बच्चा छूट जाने पर यह वायरस फिर से अपना असर दिखा सकता है। भारत सरकार ने चरणबद्ध एकल टीका अभियान पूरा होने के बाद एम आर टीके को नियमित टीकाकरण में शामिल करने का फैसला किया है।

सौ प्रतिशत बच्चों को टीके दिए जाने के लिए सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ मिलकर कोशिश कर रहे हैं। टीकाकरण अभियान को सफल बनाने के लिए यूनिसेफ रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट मीडिया, सामुदायिक एवं धार्मिक नेताओं को इससे जोड़ने की कोशिश कर रहा है। अभियान की गति कम होने के दो तीन कारण सामने आए हैं। जानकारी की कमी, टीकाकरण की जरूरत और इसके फायदे से ना वाकफियत, माता पिता के पास समय का अभाव, टीके देने की जगह, दिन, तिथि का मालूम न होना और गलतफहमी या विरोधी प्रचार आदि। यूनिसेफ संदेशों के प्रसारण के लिए रेडियो पेशेवरो की मदद ले रही है। रेडियो पत्रकारों ने टीकाकरण से संबंधित अच्छे और प्रभावी संदेश बनाए हैं जैसे वादा भूल न जाना टीका जरूर लगवाना आदि। यूनिसेफ अच्छे संदेशों के लिए रेडियो पत्रकारों को रेडियो 4 चाइल्ड पुरस्कार से सम्मानित करता है। उसने प्रिंट मीडिया के पत्रकारों को स्वास्थ्य पर लिखने के लिए प्रशिक्षण देने की भी योजना बनाई है। पिछले दिनों यूनिसेफ ने आई आई एम सी के साथ तीन महीने का पायलट प्रोजेक्ट किया था। इसके तहत तीस छात्रों ने ट्रेनिंग ली। अप्रत्याशित तौर पर उन सभी को मीडिया में जगह मिल गई। यूनिसेफ इस कार्यक्रम को और आगे बढ़ाना चाहता है।

कहते हैं इलाज से बेहतर है बचाव। बीमारी से बचने के लिए तरह तरह की तदबीरें अपनाई जाती हैं। सवाल यह है कि छोटे बच्चों को बीमारियों से कैसे बचाया जाए। जन्म से पांच वर्षों के दौरान बच्चों के जीवन को सबसे अधिक खतरा होता है। भारत में निमोनिया, दस्त, टेटनस और पोषण की कमी से आम तौर पर बच्चों की मौतें होती हैं। वायरस और बैक्टरिया से होने वाली बीमारियां भी उनके लिए घातक मानी जाती हैं। बच्चों को बचाने के लिए दुनिया भर में आजमाया हुआ तरीका टीकाकरण है। जो कोस्ट इफेकटीव होने के साथ हर तरह से सुरक्षित है। यह आर्थिक नुकसान से भी माता पिता को बचाता है। मसलन अगर बच्चा बीमार हो जाए तो माता पिता की दिहाड़ी तो छूटती ही है साथ ही बच्चे को डॉक्टरों को दिखाने और दवा-दारू में बड़ी राशि खर्च हो जाती है। बच्चे देश का भविष्य हैं उनकी सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है। सरकार के साथ जनता को मिलकर स्वास्थ्य अभियान सफल बनाना होगा तभी हर बच्चा सुरक्षित और हर गोद आबाद रह पाएगी। स्वस्थ समाज से ही स्वस्थ देश का सपना पूरा हो सकता है।

YogeshVajpeyi
Former Editor,
The Indian Express
It is now universally accepted by medical fraternity, heath workers as well large sections of general public that immunization is one of the most cost-effective public health interventions that currently averts an estimated 2 to 3 million deaths every year globally.

India has one of the largest immunisation programmes in the world, in terms of number of beneficiaries, geographical coverage and quantities of vaccine used, with nearly 27 million new born babies and 30 million pregnant women targeted for immunisation each year. Over 9 million immunisation sessions are held every year across the country through a massive 27,000 cold chain stores.

Though significant improvement has taken place in the past few years, the country still accounts for the largest number of children who are not immunized: 7.4 million,

To meet this challenge the  Union Ministry of Health and Family Welfare (MOHFW) has scaled up its immunisation programme by introducing new vaccines  and launching some of the world’s largest mass immunisation campaigns.

Mission Indradhanush was launched on 25th December 2014 with the aim of expanding immunization coverage to all children across India by year 2020 against seven vaccine preventable diseases namely Diphtheria, Pertussis, Tetanus, Childhood Tuberculosis, Polio, Hepatitis B and Measles. New vaccines such as measles-rubella vaccine, rotavirus vaccine, and Japanese encephalitis were subsequently included in the government’s Universal Immunisation Programme and some of the world’s largest campaigns to protect children against these killer deceases launched.

However, despite this extensive coverage, India accounts for more than 20 per cent of child mortality worldwide. Only 65 per cent the children in India have received all vaccines during the first year of their life. The national average for full immunization is 61 per cent, and for DPT-3 coverage, 72 per cent. In nearly two-third of districts in India (402 out of  6010 )  the DPT-3 coverage is below 80 per cent.

This underlines a pressing need for sustained interventions, particularly in areas of low routine immunization (RI) rate. Addressing the challenges faced in ensuring universal coverage of immunization is, therefore, of paramount importance.

Apart from other factors such as reaching the unreached by improving the public health delivery system in terms of infrastructure and trained and motivated manpower, paranoia about vaccines has been a long-standing problem in India, as was seen during the pulse polio campaign. That resistance to vaccines persists has been demonstrated in recent Measles-Rubella and Rotavirus vaccination campaigns in pockets of India.

Our first and immediate tasks, therefore, must be a sustained efforts by all the stakeholders—the government, the medical fraternity and the civil society—to demolish myths about vaccinations that are borne out of ignorance or motivated sectarian interests.

The media has always played an instrumental role in supporting and enriching quality discourse on Public health and hence increasing acceptance of critical health initiatives and Radio, in particular, has emerged as a powerful medium as it caters to an audience which may not be literate or have access to television to be informed.

The  All India Radio (AIR) providing radio coverage to 99.14 per cent of the population and nearly 159 million Radio listeners in the country tuning in for AIR and other stations, this medium is increasingly being recognised as a crucial point of contact with the remotest and hard to reach populations of the country.

The vast reach and infrastructure of radio may be leveraged for informed public discourse to create a supportive environment which will enhance the reach of RI in remote areas where radio is often the main source of mass media.

Bearing in mind the critical role of this medium in reaching out to people and in shaping their decision making process, UNICEF has been actively involved in organising capacity building workshops for health journalists, editors, writers and radio jockeys. It has also introduced ‘Radio4child’awards  to engage the radio fraternity to promote awareness on Routine Immunisaiton amongst parents and caregivers.

Yogesh Vajpeyi


टीकाकरण के बारे में जानने लायक कुछ बातें

प्रमोद जोशी

मनुष्य का अस्तित्व कायम रहा है तो इसकी बड़ी वजह उसकी विवेकशीलता है। दुनिया के सभी प्राणियों में वह अकेला विवेकशील प्राणी है। उसने अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए लड़ना, समझना और खुद को बदलना सीखा है। अस्तित्व रक्षा की यह लड़ाई कई तरह की ऐसी बीमारियों से भी है, जो दूसरे जीवधारियों के कारण पैदा होती हैं। इन जीवधारियों को रोगाणु (Pathogen) कहते हैं। ये रोगाणु वायरस,बैक्टीरिया (Bacteria), कवक(Fungus) या प्रजीवाणु (Protozoa) कई प्रकार के होते हैं। इनके संक्रमण से कई तरह के रोग पैदा होते हैं।

प्रकृति ने हमारे शरीर को प्रतिरक्षा का गुण भी दिया है। हमारे खून में लाल और सफेद कोष (Cells) होते हैं। सफेद कोष का एक रूप लिम्फोसाइट्स कहलाता है। लिम्फोसाइट हमारे शरीर की रक्षा करने वाले सैनिक हैं। ये हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। टीकाकरण रोग का इलाज नहीं करता, बल्कि शरीर की प्रतिरक्षण क्षमता बढ़ाता है।टीका या वैक्सीन दो तरह से काम करता है.

  • टीकाकरण के बाद हमारे शरीर के लिम्फोसाइट उन रोगाणुओं से परिचित हो जाते हैं, जो हानिकारक हैं। इससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
  • टीकाकरण के बाद रोग-ग्रस्त लोगों की संख्या कम होती जाती है। इससे समूह-प्रतिरक्षण (Herd immunity) का विकास होता है और रोग का प्रसार रुक जाता है। बड़े स्तर पर टीकाकरण के कारण दुनिया के काफी बड़े हिस्से से पोलियो जैसी बीमारी खत्म हो गई है। भारत में सन 2014 में पोलियो की समाप्ति को प्रमाणित किया गया।

टीकाकरण शरीर के प्रतिरक्षण तंत्र को कुछ खास रोगाणुओं की पहचान करने लायक बनाता, ताकि उनके संक्रमण को रोका जा सके या उसके असर को कम किया जा सके। पर टीके सभी तरह के वायरस, बैक्टीरिया या प्रोटोज़ोआ के खिलाफ प्रभावशाली नहीं हैं। विज्ञान की इस शाखा का विस्तार हो ही रहा है। वैक्सीन या टीका इंजेक्शन, ड्रॉप या गोली के रूप में हो सकता है।

भारत में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम

भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) गुणवत्तापूर्ण वैक्सीन का उपयोग करने, लाभार्थियों की संख्या, टीकाकरण सत्रों के आयोजन और भौगोलिक प्रसार एवं क्षेत्रों की विविधता को कवर करने के संदर्भ में विश्व का सबसे बड़ा अभियान है।राष्ट्रीय टीकाकरण नीति को वर्ष 1978 में अपनाया गया था। इसकी शुरुआत टीकाकरण के विस्तारित कार्यक्रम (ईपीआई) से हुई थी, जिसके तहत प्रारंभिक अवस्था के अस्सी प्रतिशत टीकाकरण कवरेज को बढ़ावा दिया जाना था। सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) का शुभारंभ चरणबद्ध तरीके से 1985 में शुरू किया गया। इस कार्यक्रम के तहत वर्ष 1985 में खसरे के टीके और वर्ष 1990 में विटामिन-ए के पूरकता कार्यक्रम को जोड़ा गया।

सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के तहत 7 जानलेवा बीमारियों के टीके लगाए जाते हैं। इन बीमारियों में-तपेदिक (Tuberculosis), पोलियो (Poliomyelitis), हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis B), डिप्थीरिया (Diphtheria), काली खांसी (Pertussis), टेटनस (Tetanus) और खसरा (Measles) शामिल हैं। कुछ राज्यों और जि़लों में हीमोफिलस इनफ्लुएंज़ा टाइप बी (HaemophilusInfluenzae type B) और जापानी इन्सेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) के भी टीके लगाए जाते हैं।शिशु को खसरे के टीके के साथ विटामिन ए ड्रॉप्‍स भी ली जाती है।  2002-2003 से देश के कुछ चुने हुए शहरों में हेपेटाइटिस बी के टीके को भी इस कार्यक्रम में शामिल कर लिया गया है।

भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी बच्चों को टीकाकरण के अंतर्गत लाने के लिए25दिसंबर 2014को सुशासन दिवस के अवसर पर ‘मिशन इंद्रधनुष’ शुरू किया । इंद्रधनुष के सात रंगों को प्रदर्शित करने वालेइस मिशन का उद्देश्य देश के सभी बच्चों को 2020 तक टीकाकरण के दायरे में लाना है। पहले चरण में देश में 201 जिलों की पहचान की गई, जिनमें 50 प्रतिशत तक बच्चों को टीके नहीं लगे थे या उन्हें आंशिक रूप से टीके लगाए गए थे।

शिशु-टीकाकरण

टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार अस्पताल या किसी संस्थान में जन्‍म लेने वाले सभी शिशुओं को जन्‍म लेते ही या अस्पताल छोड़ने से पहले बीसीजी का टीका, पोलियो की जीरो खुराक और हेपेटाइटिस बी का टीका लगा दिया जाना चाहिए। अस्पताल या संस्थान में जन्‍म लेने वाले शिशुओं को डीटीपी का पहला टीका, पोलियो की पहली खुराक, हेपेटाइटिस बी का पहला टीका और बीसीजी का टीका डेढ माह (6सप्ताह) का होने पर दिया जाता है। ढाई महीने (10सप्ताह) का होने पर शिशु को डीपीटी का दूसरा टीका, पोलियो की दूसरी खुराक और हेपेटाइटिस बी का टीका देना जरूरी है।

साढ़े तीन महीने (14सप्ताह)  का होने पर डीपीटी का तीसरा टीका, पोलियो की तीसरी खुराक और हेपेटाइटिस बी का तीसरा टीका देना जरूरी है। अन्त में नौवें महीने (270दिन) के तुरन्त बाद और एक वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले शिशु सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए हर हालत में खसरे का टीका लगवाना चाहिए। खसरे के टीके के साथ-साथ विटामिन ए की पहली खुराक भी दी जानी चाहिए। विटामिन ए की दूसरी खुराक 16 - 24 महीने का होने पर दी जानी चाहिए। विटामिन ए की बाकी तीन खुराकें तीन साल 6 महीने के अन्‍तराल पर दी जानी चाहिए। बच्चे को विटामिन ए की कुल पाँच खुराकें दी जानी चाहिए।

खसरा-रूबेला टीका

खसरा का टीका हमारे सार्वभौमिक टीकाकरण का हिस्सा है। गत 5 फरवरी को केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री नेबेंगलुरु में हुए एक समारोह मे खसरा-रूबेला संयुक्त टीका लांच किया है। खसरा-रूबेला (MR) टीके के पहले चरण की शुरुआत पाँच राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों कर्नाटक, पुदुच्चेरी, तमिलनाडु, गोवा तथा लक्षदीप से हो रही है। यह संयुक्त टीका वर्तमान मे खसरा हेतु दी जाने वाली दो खुराकों को जो 9-12 माह तथा 16-24 माह पर बच्चों को दी जाती हैं एकल खुराक से प्रतिस्थापित करेगा| इसकी मात्र एक खुराक 9-15 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को एक बार दी जाएगी, भले ही पहले उन्होंने खसरा/रूबेला का टीका लिया हो या नहीं|
इस अभियान के अंतर्गत पूरे देश मे 41 करोड़ बच्चों को सम्मिलित किया जाएगा, जो किसी भी अभियान का अब तक का सबसे बड़ा लक्ष्य है|रूबेला को ‘जर्मन खसरा’ भी कहते हैं | यह एक संक्रामक रोग है जो रूबेला वायरस के कारण होता है| बच्चों मे बुखार, सिरदर्द, फैलने वाले चकत्ते और कान के पीछे या गर्दन की लासिका ग्रंथियों मे वृद्धि जैसे लक्षण पाए जाते हैं| गर्भवती महिलाओं मे रूबेला संक्रमण भ्रूण की मृत्यु या जन्मजात विकारों के कारण बन सकता है।

गर्भवती महिलाओं के लिए टीके

गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान जल्दी से जल्दी टिटनेस टॉक्‍साइड(टीटी) के  दो टीके लगाये जाने चाहिए। इन टीकों को टीटी1 और टीटी2 कहा जाता है। इन दोनों टीकों के बीच चार सप्ताह का अन्तर रखना आवश्यक है। यदि गर्भवती महिला पिछले तीन वर्ष में टीटी के दो टीके लगवा चुकी है तो उसे इस गर्भावस्था के दौरान केवल बूस्टर टीटी टीका ही लगवाना चाहिए।
यदि गर्भवती महिला गर्भावस्था के दौरान देर से अपना नाम दर्ज कराए तब भी टीटी के टीके लगाए जाने चाहिए। टीटी का टीका माँ ओर बच्चे को टिटनेस की बीमारी से बचाता है। भारत में नवजात शिशुओं की मौत का एक प्रमुख कारण जन्‍म के समय टिटनेस का संक्रमण होना है। इसलिए अगर गर्भवती महिला टीकाकरण के लिए देर से भी नाम दर्ज कराए तब भी उसे टीटी के टीके लगाए जाने चाहिए। किन्तु टीटी2 (या बूस्टर) टीका प्रसव की अनुमानित तारीख से कम से कम चार सप्ताह पहले दिया जाना चाहिए। ताकि उसे उसका पूरा लाभ मिल सके।

बढ़ते कदम

सामान्यतः ग्रामीण बच्चों के टीकाकरण का चक्र अधूरा रह जाने का अंदेशा ज्यादा होता है। यह खामी सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश में उजागर हुई है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असमानता केरल में देखने को मिली है। इसके बाद छत्तीसगढ़ और हरियाणा का स्थान है। 

हर साल देश में सामान्य टीकाकरण के नौ करोड़ सत्र होते हैं। इनमें 2.6 करोड़ बच्चों और तीन करोड़ गर्भवती माताओं को कवर किया जाता है। इस काम को पूरा करने के लिए 27,000 कोल्ड चेन स्टोर की मदद ली जाती है। भारत में पूर्ण टीकाकरण की दिशा में राष्ट्रीय औसत 61 फीसदी है और डीपीटी-3 की कवरेज 72 प्रतिशत है। देश में जिन जिलों में डीपीटी-3 के मामले में कवरेज 80 फीसदी से कम है, उनकी संख्या कुल 601 में से 403 है। यानी 67 फीसदी जिलों में अभी कवरेज 80 फीसदी से कम है। भारत में उन बच्चों की संख्या सबसे बड़ी है, जिनका डीपीटी-3 के तहत टीकाकरण नहीं हुआ है। यह संख्या है 74 लाख।

हरेक राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस पर 17.2 करोड़ बच्चों को पोलियो का टीका दिया जाता है। भारत के पोलियो टीकाकरण अभियान के अंतर्गत हर साल 80 करोड़ बच्चों का पोलियो टीकाकरण होता है। देश के 13.5 करोड़ बच्चों को खसरे का दूसरा टीका सुनिश्चित करने के लिए तीन वर्षीय अभियान चलाया गया, जिसके तहत अकेले 2012-13 में सात करोड़ बच्चों को कवर किया गया। सन 2012-13 में चलाए गए एक विशेष अभियान के तहत एक करोड़ 53 लाख 50 हजार टीकों की खुराकें उन बच्चों को दी गईं, जिनकी खुराकें छूट गईं थीं।

प्रमोद जोशी

पोलियो एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज संभव नही है।

RAJENDRA SINGH

विश्व स्वास्थ संगठन के सतत प्रयासों से दुनिया के कई देश पोलियो मुक्त हो चुके हैं जिनमें भारत का नाम भी शामिल है। आजादी क बाद भारत में भूखमरी गरीबी आवास आदि समस्याएं तो थी ही साथ ही पोलियो नामक बीमारि भी भारत में मुंह बाए खड़ी थी जिसका यदि समय से उपचार ना किया जाए तो पीढ़ियों तक इस रोग का दंश झेलना पड़ता है। पोलियो एक ऐसी बीमारी है जिसमें रोगी का शरीर लकवा ग्रस्त हो जाता है और नौनिहाल विकलांग हो जाते हैं। शरीर का एक हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है जिससे रोगी को अपनी आमदिनचर्या के कामों पर भी दूसरे लोगों पर निर्भर होना पड़ता है।

विश्व स्वास्थ संगठन की मानें तो भारत अब पोलियो मुक्त राष्ट्र बन चुका है। यहां यह बताना जरुरी है कि WHO किसी भी देश को पूर्ण पोलियो मुक्त राष्ट्र तब घोषित करता है जब उस देश में लगातार तीन साल तक पोलियो के एक भी मामले सामने नही आते हैं।

भारत ने इस कामयाबी को हासिल करने क लिए लगभग 18 साल तक सतत प्रयास किया है । तब जाकर भारत एक पोलियो मुक्त राष्ट्र बना है। आगे आने वाले समय में  पोलियो का एक भी केस न हो इसलिए पोलियो के संभावित खतरे को ध्यान मे रकते हुए 2017 में भारत सरकार की ओर से एक बार फिर पल्स पोलियो अभियान का आरंभ किया गया। 2017 में राष्ट्रीय प्रतिरक्षा दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी व स्वास्थ मंत्री जेपी नड्डा ने इस अभियान की शुरुआत की।

इस अभियान मे देश से पोलियो के जड़ से खात्‍मे के लिए शुरू हुए अभियान में पांच वर्ष से कम आयु के लगभग 17 करोड़ बच्चों को पोलियो खुराक पिलाई जाएगी. इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री जे.पी.नड्डा ने कहा कि 27 मार्च, 2014 को भारत समेत विश्व स्वास्थ्य संगठन के समस्त दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र का पोलियो मुक्त प्रमाणीकरण जन्म स्वास्थ्य के इतिहास में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है

   

पोलियो टीकाकरण अभियान किसी एक बीमारी के खिलाफ चले अबतक के सबसे बड़े और लंबे अभियानों में से एक रहा है| ‘दो बूंद जिंदगी की’ का नारा इतना सफल रहा, जिसकी शायद आरंभ में कल्पना भी नहीं थी| संयुक्त राष्ट्र ने 1988 में विश्व को पोलियो मुक्त करने का अभियान आरंभ किया था| भारत में दिल्ली सरकार में 1993 से 1998 तक स्वास्थ्य मंत्री रहने के दौरान डॉ हर्षवर्धन ने दिल्ली में पल्स पोलियो कार्यक्रम की शुरुआत की थी| यह 1995 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना में शामिल होकर देशव्यापी अभियान में परिणत हुआ|

भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और रोटरी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने इनमें अहम भूमिकाएं निभायीं| इसके अलावा अनेक नेता,मंत्री, कलाकार, खिलाड़ी, नामचीन लोगों ने इसका प्रचार किया| इस दौरान ‘दो बूंद जिंदगी की’ वाकई एक मुहावरे की तरह सबकी जुबान पर रहता था| स्थानीय स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने भी इसमें भूमिका निभायीं और सामाजिक संगठनों ने भी| यदि पूरा देश इसमें एक होकर नहीं लगता, तो हम आज इस स्थिति में नहीं पहुंचते|

उत्तर प्रदेश और बिहार देश के दो ऐसे राज्य रहे हैं जहां कभी पोलियो के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। 2010 तक इन राज्यों में पोलियो के ग्रआफ में तेजी से गिरावट आई और धीरे धीरे यहां से भी पोलियो विलुप्त हो गया।

  बेशक आज भारत पोलियो मुक्त राष्ट्र बन चुका है लेकिन जब तक विश्व के किसी भी कोने में पोलियो के वायरस मौजूद रहेगे ये ये संकट टलेगा नही। गौरतलब है कि भारत के पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान और अफगानिस्तान आज भी पोलियो मुक्त नही हो पाए हैं. ऐसे में भारत में एक बार फिर पोलियो अपना गढ़ बना सकता है।

    आज के समय में यदि कम समय में अधिकतम लोगों तक ज्यादा से ज्यादा जानकारी पंहुचानी हो तो रेडियो और टेलीविजन अच्छा माध्यम है। अमिताभ की दमदार आवाज में दो बूंद जिंदगी का एड कौन भूल सकता है। शाहरुख खान और कई बड़ी हस्तियां भी इस अभियान में हाथ बंटा चुकी है। ऐसे में रेडियो और टीवी पर हस्तियों के साथ जागरुकता अभियान काफी सार्थक हो सकता है।

सोशल मीडिया पर भी पोलियो से संबंधित जानकारियों का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करना चाहिए ताकि कई पीढ़ियां इस बीमारी से दूर रह सकें। गांवो औऱ शहरों दोनो पर स्वास्थ संगठनो को बराबर ध्यान दोना चाहिए । देखा गया है कि शहरों की तुलना में गांवों में लोग इस बीमारी को लेकतर कम जागरुक हैं। पोलियो ड्रॉप्स की सुनिश्चित किया जाना नितांत आवश्यक है।

इन सबके साथ ये भी जरुरी है कि समय समय पर यह जरुर जांचा जाए की पोलियो के वायरस तो सक्रिय रुप से हमारे आस पास के वातावरण में नही है।

RAJENDRA SINGH

रेडियो बन सकता है टीकाकरण का सशक्त संचार माध्यम

ज्ञानेंद्र पाण्डेय

रेडियो बन सकता है टीकाकरण का सशक्त संचार माध्यम ण्ण्ण्ण्ण्ण् जनहित के किये किये जाने वाले किसी भी महाभियान को प्रभावशाली तरीके से आम जन तक पहुँचाने के मकसद से रेडियो एक सशक्त माध्यम बन सकता है ण् आम जन तक सर्वाधिक पहुँच बनाने वाले इस माध्यम ने अतीत में भी जन जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है ण् बहुत समय पामे पहले आकाशवाणी के कृषि दर्शन कार्यक्रम ने अपनी धूम मचा राखी थी ण् किसानो की समस्याओं का समाधान करने के साथ ही खराब मौसम एखेती को नुक्सान पहुँचाने वाली बीमारियों ए प्राकृतिक विपदा तथा दूसरी तमाम तरह की परेशानियों से बचाव के कार्यक्रम काफी लोक प्रिय हुआ करते थे ण् यही नहीं रेडियो सीलोन से प्रसारित होने  वाले बिनाका गीतमाला कार्यक्रम से तो अमीन सायानी  का पूरी दुनिया में ही नाम हो गया था आज भी लोग अमीन सायानी कि आवाज़ को याद करते हैं 

ण्हिंदी के समाचार वाचकों में देवकी नंदन पाण्डेय   कि बुलंद आवाज़ आज भी लोगों को याद है ण्ऐसे एक नहीं अनेक रेडियो प्रोग्राम हैं जो जनता के मन को छू लेने की मिसाल बन गए हैं ण्आकाशवाणी ए ऍफ़ एम्रडियो समेत तमाम ऐसे रेडियो स्टेशन हैं जो टीकाकरण को भी बुलंदियों के शिखर तक पहुंचा सकते हैं जरूरत इतनी ही है कि रेडियो में प्रोग्राम ऐसे बने जो लोगों को बड़ी तादाद में टीकाकरण स्थल तक पहुंचाएं ण्ण्कैसे हों रेडियो के ये प्रोग्राम इस बारे में भी विस्तार से चर्चा करने की जरूरत है

दो से तीन मिनट की अवधि के छोटे . छोटे प्रोग्राम सुनने वाले को बोर भी नहीं करेंगे और  जनता तक टीकाकरण के फायदे भी पहुंचा देंगे ण्बचपन में सुना करते थे कि सरकार परिवार नियोजन से लेकर मलेरिया जैसे रोग के बचाव के लिए कुछ ऐसे प्रोग्राम रेडियो के माध्यम से प्रसारित करवाती थी और इनका प्रभाव भी हुआ करता था ण् इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए टीकाकरण के सन्दर्भ में भी नए सिरे से रेडियो प्रोग्राम बनाने और उनका प्रसारण करने की आज सबसे बड़ी जरूरत है ण्रेडियो के इन कार्यक्रमों को अलग . अलग शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है  मसलन  क्या है टीकाकरण ए क्यों जरूरी है टीकाकरण ए किस तरह के रोगों की रोकथाम के लिए किया जाता है टीकाकरण एक्या हैं टीकाकरण के फायदे और क्या होती है वेक्सीन ए अलग . अलग रोगों के लिए क्या अलग होती है वेक्सीन ए दुनिया के देशों में कैसे होता है टीकाकरण ए वैश्विक धरातल में क्या है भारत की स्थिति ए हर साल कितने लोग मर जाते हैं टीकाकरण न करने के कारण और कहाँ करा सकते हैं 

टीकाकरण जैसे कुछ विषयों पर प्रोग्राम बना कर रेडियो के माध्यम से प्रसारित किया जा सकता है ण्इनका असर व्यापक रूप से पड़ेगा और टीकाकरण अभियान को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता ण्जनहित के साथ ही राष्ट्रहित में भी इससे बड़ा कोई और काम नहीं हो सकता ण्पर ये कार्यक्रम रोचक हों जो सीधे इंसान को टीकाकरण के लिए प्रेरित कर सकें

टीकाकरणए जन स्वास्थ्य और संचार माध्यम ण्ण्ण्ण्ण्ण्कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है और जब मन स्वस्थ होता है तभी इंसान कुछ कर भी पाता है  इसलिए कुछ भी करने के लिए शरीर  का स्वस्थ होना नितांत जरूरी है ण् शरीर तभी स्वस्थ रागेगा जब रोग मुक्त हो और रोग मुक्त होने के लिए जरूरी है कि रोग होने से पहले ही उपचार कर लिया जाए ण्कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जो बचपन में ही व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और समय रहते उपचार न करने पर  ला इलाज हो जाते हैं बड़े होने पर ये रोग जानलेवा भी हो जाते हैं 

पोलियो समेत ऐसे कई रोग हैं जो बचपन से ही मनुष्य को अपनी लपेट में ले लेते हैं और मरते दम ताम तक इंसान को परेशान करते रहते हैं ण्ऐसे रोग जिनका पता नहीं चल पाता  उनका भी इलाज होता है और ये इलाज एहतियात के तौर पर ही किया जाता है ए एहतियाती इलाज को ही टीकाकरण कहा जाता है और यह टीकाकरण बचपन में ही कर लिया जाता है ताकि रोग के पनपने की संभावना  ही न रहे और बछा बड़ा होकर भी स्वस्थ बना रहे ए लेकिन अशिक्षा और अभाव के चलते देश की एक बड़ी आबादी  टीकाकरण न करवाने के चलते पोलियो जैसे रोगों का शिकार हो जाती है ण्इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि लोग जागरूक नहीं हैं और संचार माध्यम समय पर उनको जागरूक नहीं कर पाते या फिर  वो सरकार तथा अंतर राष्ट्रीय संगठनों द्वारा चलाये जा रहे टीकाकरण अभियान का हिस्सा नहीं बन पाते ण् यूनिसेफ जैसी संस्था इस दिशा में सराहनीय काम कर रही है और इस अभियान से जुड़े संचार माध्यमों की बदोलत अब बड़ी संख्या में लोग टीकाकरण अभियान से जुड़ भी रहे हैं ण्पर देश की आबादी के घनत्व को देखते हुए संचार माध्यमो की भूमिका को उतना सराहनीय नहीं कहा जा सकता जिस अनुपात में यूनिसेफ का अभियान विस्तार फलक से जुड़ गया है

उनिसेफ़ ने तो रेडियो जैसे सशक्त जन संचार माध्यम को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया लेकिन सरकारी और निजी क्षेत्र के कुछ अपवाद रेडियो पत्रकारों के अलावा शेष लोगों की प्राथमिकता शायद कुछ और ही है इसलिए स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों का रेडियो तंत्र में अभाव ही दिखाई देता है ण्जन स्वास्थ्य और टीकाकरण जैसे कार्यक्रमों की अनदेखी करना एक खतरे का संकेत देता है क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही से इन जन्मजात रोगों से असमय मौत का शिकार होने वाले लोगों का आंकड़ा खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है  इन रोगों से साल भर में कितने लोग मरते होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले टीकाकरण अभियान से ही हर साल दुनिया में औसतन दो से तीन मिलियन यानी बीस से लेकर तीस लाख लोगों को टीकाकरण के जरिये इस रोग से बचाया गया है भारत में टीकाकरण की स्थिति संतोषजनक ही नहीं बलि दुनिया में सबसे बेहतर मानी जाती है ण् भारत  में  यूनिसेफ के टीकाकरण अभियान को  विश्व सबसे बड़ा अभियान बताया गया है 

अभियान के बृहद आकार को देखते हुए ही यहाँ प्रत्येक वर्ष  सताईस मिलियन यानी दो करोड़ सत्तर लाख नवजात शिशुओं को टीकाकरण अभियान से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है और इस लक्ष्य को शत प्रतिशत हासिल करने के प्रयास भी जारी हैं इस लक्ष्य को हासिल करने की गरज से ही भारत में हर साल  नब्बे लाख टीकाकरण सत्रों का आयोजन भी किया जा रहा है और इसके सार्थक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं भारत सरकार के टीकाकरण अभियान इन्द्रधनुष के तहत देश को रोग मुक्त करने की एक अच्छी पहल शुरू की गई है लेकिन दुःख की बात ये है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक भारत के पैंसठ प्रतिशत बच्चों का ही टीकाकरण हो सका है ण् साफ़ है कि देश के पैंतीस प्रतिशत बच्चे इस सुविधा से वंचित हैं ण्देश की आबादी का यह हिस्सा बहुत बड़ा है और इन सब का टीकाकरण किसी चुनौती से कम भी नहीं है सवाल ये है कि सरकार और यूनिसेफ जिस लगन से इस अभियान को आगे बड़ा रहे हैं एउसे सफल बनाने में और क्या करना बाकी है ण् ये तो थी अब तक पैदा हुए बच्चों के टीकाकरण करने और रोगमुक्त करने की बात इसी सन्दर्भ में हर रोज़ और पैदा होने वाले बच्चों के टीकाकरण की बात भी  करें तो अभियान की व्यापकता का अहसास हो सकता है ण्काम कोई भी हो असंभव जरूर हो सकता है लेकिन हिम्मत और लगन से असंभव से असंभव काम को भी आसानी से किया जा सकता है ण् काम तो लोग ए संस्थाएं और सरकार कर ही रहे हैं जरूरत सिर्फ इतनी सी है कि रेडियो जैसे संचार माध्यम इसका इमाम्दार हिस्सा बने और ऐसे लोगों को इससे जोड़ने का माध्यम बने जो अब तक इस अभियान से जुड़ नहीं सके हैं हैं

 रेडियो को जन संचार माध्यमों में जनता से सबसे का करीब का माध्यम भी माना जाता है और अब तो जब से मोबाइल में रेडियो आ गया है इसकी पाहून और बढ़ गई है जो लोग पढ़ नहीं सकते वो भी रेडियो कार्यक्रमों के जरिये जागरूक बन सकते हैं ण् सवाल ये भी है कि लोगों को जागरूक करने के लिए रेडियो में किस तरह के प्रोग्राम बनाए जाएँ जो  रोचक भी हों और जागरूक बनाने का काम भी करें ण् ये प्रोग्राम बड़े भी नहीं होने चाहिए और उबाऊ भी न हों तभी लोग इन्हें रेडियो पर सुनना पसंद भी करेंगे और जब लोग रेडियो प्रोग्राम के जरिये टीकाकरण अभियान की जानकारी पायेंगे तो निश्चित ही इसससे  जुड़ना भी पसंद करेंगे ण् जब बड़ी तादाद में लोग रेडियो प्रोग्राम से जुड़ेंगे तो इस अभियान को अंजाम तक पहुँचाने में भी कामयाबी मिलेगी

ज्ञानेंद्र पाण्डेय
 सहायक संपादक  लोकसभा टेलीविज़न







​Poverty, illiteracy and early deaths await world’s most disadvantaged children: UNICEF

(04/07/2016) Media can boost growth of both by Neelam jain

NEW DELHI 28 June 2016 –Based on current trends, 69 million children under five will die from mostly preventable causes, 167 million children will live in poverty, and 750 million women will have been married as children by 2030, the target date for the Sustainable Development Goals – unless the world focuses more on the plight of its most disadvantaged children, according to a UNICEF report released today.

The State of the World’s Children, UNICEF’s annual flagship report, paints a stark picture of what is in store for the world’s poorest children if governments, donors, businesses and international organizations do not accelerate efforts to address their needs.

“Denying hundreds of millions of children a fair chance in life does more than threaten their futures – by fueling intergenerational cycles of disadvantage, it imperils the future of their societies,” said UNICEF Executive Director Anthony Lake. “We have a choice: Invest in these children now or allow our world to become still more unequal and divided.”

The report notes that significant progress has been made in saving children’s lives, getting children into school and lifting people out of poverty. Global under-five mortality rates have been more than halved since 1990, boys and girls attend primary school in equal numbers in 129 countries, and the number of people living in extreme poverty worldwide is almost half of what it was in the 1990s.

But this progress has been neither even nor fair, the report says. The poorest children are twice as likely to die before their fifth birthday and to be chronically malnourished than the richest. Across much of South Asia and sub-Saharan Africa, children born to mothers with no education are almost three times more likely to die before they are five than those born to mothers with a secondary education. And girls from the poorest households are twice as likely to marry as children than girls from the wealthiest households.

Although education plays a unique role in levelling the playing field for children, the number of children who do not attend school has increased since 2011, and a significant proportion of those who do go to school are not learning. Globally, about 124 million children today do not go to primary and lower-secondary school, and almost 2 in 5 who do finish primary school have not learned how to read, write or do simple arithmetic.

Acknowledging education to be one of the key instruments in promoting equity, the focus of the Report launch in India was on Education. Releasing the report, Louis-Georges Arsenault, Representative, UNICEF India said, “The early years are foundational and children who start behind, stay behind. There are long-term consequences, particularly for the most marginalised and disadvantaged children, when they enter school without a quality preschool education. And gaps between disadvantaged children and other children become harder to bridge at later points in their education.”

India has much to celebrate in the area of education, particularly in ensuring children’s access to school, through the Sarva Shiksha Abhiyan and implementation of the Right to Education Act. This is reflected in the near-universal enrolment in primary education and the steady decrease in numbers of out-of-school children. The number of out-of-school children between 6 to 13 years has declined from approximately 8 million in 2009 to 6 million in 2014. Yet challenges still remain. In India, out of the 74 million[1] children between 3-6 years, about 20 million were not attending any preschool education in 2014, and it is the children from the poorest families and marginalised communities who are often left behind[2].

The report points to evidence that investing in the most vulnerable children can yield immediate and long-term benefits. Globally, cash transfers, for example, have been shown to help children stay in school longer and advance to higher levels of education. On average, each additional year of education a child receives increases his or her adult earnings by about 10 per cent. And for each additional year of schooling completed, on average, by young adults in a country, that country’s poverty rates fall by 9 per cent.

Inequity is neither inevitable, nor insurmountable, the report argues. Better data on the most vulnerable children, integrated solutions to the challenges children face, innovative ways to address old problems, more equitable investment and increased involvement by communities – all these measures can help level the playing field for children.

Dr S. C Khuntia, Secretary, Department of School Education and Literacy, Ministry of Human Resource Development, Government of India, Dr Rajesh Kumar, Joint Secretary, Ministry of Women and Child Development, Government of India, Professor Shyam Menon, Vice Chancellor of Ambedkar University, Delhi, and several other dignitaries from the field of academics, policy, civil society, CSR heads and media were also present at the launch.

Three parallel sessions were also held after the launch, involving children from the Nine is Mine campaign, youth activists from Youth Ki Awaaz and top CSR heads emphasising that everyone has a role to play to make sure that every child can have a fair start in life. The ‘Fair Start’ film, unveiled recently as part of a UNICEF India led social media campaign, was also screened during the launch. The film focuses on persisting inequities that large groups of children in India face, affecting their survival, growth and development.

About UNICEF UNICEF promotes the rights and wellbeing of every child, in everything we do. Together with our partners, we work in 190 countries and territories to translate that commitment into practical action, focusing special effort on reaching the most vulnerable and excluded children, to the benefit of all children, everywhere. For more information about UNICEF and its work visit: www.unicef.org. Follow us on Twitter and Facebook

For more information, please contact: Manisha Mishra, Communication Specialist, UNICEF India, + 91 981 810 5861, mamishra@unicef.org Sonia Sarkar, Communication Officer, UNICEF India, +91 981 017 0289, ssarkar@unicef.org

CMRT supports UNICEF in spreading awareness on Team Swachh, a nationwide social movement on sanitation, by leveraging its reach among district journalists and sharing it with its readers

After Dharamshala, Mohali, Delhi, Kolkata and Nagpur the ICC World T20 Trophy made its way to Chennai as part of the ICC WT20 Host City Tour.

A specially designed double-decker bus carried children from local NGOs along with Indian cricket team players Dinesh Karthik and women’s team captain Mithali Raj. The players interacted with fans as the cavalcade made its way from the city’s iconic Marina to the M.A Chidambaram Stadium. The students also had a chance to hit a few balls and bowl to Mithali.

Building up to the ICC World T20 in India, the International Cricket Council (ICC) Cricket for Good and UNICEF in partnership with BCCI launched the Team Swachh clinics during the ICC WT20 Host City Tour to promote a nationwide initiative that aims to build a social movement for sanitation.

Chennai will host four women’s league games featuring West Indies, Pakistan, Bangladesh, South Africa, Ireland and England between March 16 and 27.

Goal after goal, kick forward, bounce back, goal and more goal…

New Delhi: ‘Study and take lead in life, play and you will end up spoiling your chances in life’ was the lesson from his father that seeped deep in the heart and mind of Budhan. “Son of a poor man is better off earning some money instead of wasting his time on sports…..sports are meant for the rich Sir…a labour like me can’t afford to let his son play because if he goes out and works, he will at least earn something.”

But today Budhanappears to be a changed person. His eyes becomes moist when he watches Pankaj scoring goals, hears him shoutin, “Hey! Give me the pass…hit the ball,” With an emotionally choked voice he says, “Now my son can also be a success.” Behind Budhan’s growing faith in his son is the belief and hard work of Paul Schuttenbelt, Chairman of Delhi Youth League. Thanks to Paul’s efforts Delhi Youth League is being organized for the second time in Delhi.

While 28 teams played in the first season of Delhi Youth League, 70 teams are participating this time around. Among the participants are 1,500 children belonging to different backgrounds, nationalities and languages and uniting them all is their love for football. Some of them are from slums, some from the government schools and well known private schools, while many others have come from international schools. Their uniforms and colours are different and they belong to different age groups but football is their common mission.

‘What they do know is that sport does not divide people and all they want to do is to score goal after goal’.

Paul Schuttenbelt says, “The purpose behind the Delhi Football League was to take the game of soccer to the grassroots. We believe that sports itself is a great teacher and all that we have been striving was to ensure that irrespective of their background all children got equal opportunities. Sports are also an excellent medium of learning”.

Paul further adds that a similar experiment has yielded excellent results in Vietnam and Europe. He says, “Right now we are active only in Delhi but our plan is to create such football leagues in other cities as well, so that more and more children are attracted to play the game of soccer.”

Appreciating the help extended by the Embassy of the Netherlands in organisiing the league he says, “The Sports Authority of India has been very appreciative of the efforts. Our effort is to now initiate a similar league for girls in November.”

Immunization ‘game-changers’ should be the norm worldwide, says UN health agency

21 April 2016 – The UN World Health Organization (WHO) announced that during World Immunization Week 2016, which begins Sunday, it will be highlighting recent gains in immunization coverage, and outlining further steps countries can take to meet global vaccination targets by 2020.

“Last year immunization led to some notable wins in the fight against polio, rubella and maternal and neonatal tetanus,” says Dr Margaret Chan, WHO Director-General, in a press release.

“But they were isolated wins. Polio was eliminated in one country, tetanus in three, and rubella in one geographical region. The challenge now is to make gains like this the norm,” she added.

According to WHO, immunization averts two to three million deaths annually; however, an additional 1.5 million deaths could be avoided if global vaccination coverage improves. Today, an estimated 18.7 million infants – nearly one in five children worldwide – are still missing routine immunizations for preventable diseases, such as diphtheria, pertussis and tetanus.

In 2012, the World Health Assembly endorsed the Global Vaccine Action Plan (GVAP), a commitment to ensure that no one misses out on vital immunizations. Despite gains in vaccination coverage in some regions and countries the past year, global vaccination targets remain off track.

WHO noted that only one out of six targets is on track – the introduction of new or underutilized vaccines in low- and middle-income countries. During the past five years, 86 low- and middle-income countries have made 128 introductions of the following vaccines: Hib-containing vaccine, pneumococcal conjugate vaccine (PCV), rotavirus vaccine, human papillomavirus vaccine (HPV), rubella and inactivated polio vaccine.

The target is to introduce one or more new or underutilized vaccines in at least 90 low- and middle-income countries by 2015.

Game-changers in immunization

Last year reportedly saw some major breakthroughs.

India joined Cambodia, Madagascar and Mauritania in eliminating maternal and neonatal tetanus. It also improved coverage of the diphtheria-tetanus-pertussis-containing vaccines (DTP3) to 83 per cent.

Despite challenges imposed by Ebola, including for routine immunization coverage, the African Region became one-step closer to being certified polio-free with the removal of Nigeria from the list of polio-endemic countries. As recently as 2012, the country accounted for more than half of all polio cases worldwide. Now, only two countries – Afghanistan and Pakistan – remain polio endemic.

The Region of the Americas became the first to eliminate rubella, a contagious viral disease that can cause multiple birth defects as well as foetal death when contracted by women during pregnancy. Additionally, five years after the introduction of an affordable conjugate meningitis A vaccine, immunization of more than 230 million people has led to the control and near elimination of deadly meningitis A disease in the African “meningitis belt” that stretches from Senegal to Ethiopia.

New vaccines against dengue, Ebola and malaria have the potential to be game-changers in immunization in the near future. For example, through a “ring-vaccination” strategy, the Ebola vaccine is being given to anyone who has come into contact with a person infected with Ebola, as well as contacts of theirs.

And, the new polio vaccination regimen, with the withdrawal of type 2 oral polio vaccine in 155 countries this month, represents a critical step towards a polio-free world.

“Although the world has seen some achievements in immunization, global vaccination coverage has stalled the past few years,” said Dr Flavia Bustreo, WHO Assistant Director-General Family, Women and Children’s Health and Vice-Chair of Gavi, the Vaccine Alliance Board. “Far too many opportunities to reach unvaccinated children and close the immunization gap are still being missed every day.”

Reducing missed opportunities

To improve vaccination coverage, WHO is calling on countries to reach more children missed by routine delivery systems, especially those living in countries, districts or areas where less than 80 per cent of them are receiving vaccines or those living in countries affected by conflicts or emergencies.

More than 60 per cent of children who are unvaccinated live in 10 countries: the Democratic Republic of the Congo, Ethiopia, India, Indonesia, Iraq, Nigeria, Pakistan, the Philippines, Uganda and South Africa.

Equally, when a child or adult who is unvaccinated or not fully vaccinated visits a health facility for any reason, their vaccination record should be checked by healthcare workers and they should be given all vaccines they are missing.

However, recent field assessments in American and African Regions have shown that between 23 and 96 per cent of eligible children who visited a health facility for vaccination or for medical care, left the health facility without receiving the vaccine doses they needed.

“These children are not what we would consider ‘hard-to-reach’ or underserved populations,” said Dr Jean-Marie Okwo-Bele, Director of Immunization, Vaccines and Biologicals at WHO. “Children who are already present in health facilities are easy wins in improving vaccination coverage.”

Women wait to have their children vaccinated against polio in a health centre in Erbil, Kurdistan region of Iraq. Photo: UNICEF/Anma.

Getting back on track

Many of the successes achieved last year resulted from strengthened leadership and accountability at all levels¬ – national, regional and global.

“When countries and partners establish and enforce clear accountability systems, measure results and take corrective action when results are not achieved, gaps in immunization can be closed,” added Dr Okwo-Bele.

Last year, the Strategic Advisory Group of Experts on Immunization (SAGE) identified 5 factors to achieving significant results in immunization coverage:

In strengthening the quality and use of data, the World Health Assembly passed a resolution last year on vaccine pricing, which called on countries to provide their vaccine prices to WHO. The agency’s database currently contains 1,600 vaccine price records on almost 50 different types of vaccines from 42 countries, but also from international buyers such as the procurement platform available in the WHO Region of the Americas and from the UN Children’s Fund (UNICEF), making it the largest international vaccine price database.

Because prices paid for vaccines represent a large share of countries’ immunization budgets and the prices of new vaccines are higher than those of traditional vaccines, the agency noted that costs represent a strong barrier to countries introducing new vaccines.

First Critical Appraisal Skills Programme in Public Health Journalism byUNICEF, IIMC, University of Oxford, GIGH and Thomson Reuters Foundation

New Delhi, 25 th April 2016—The first-of- its-kind ‘Critical Appraisal Skills’ (CASP) course certificate in Public Health Journalism and Communication, was awarded to 40 budding media professionals from the Indian Institute of Mass Communication here today. Conceptualised by UNICEF, the CASP was designed in partnership with the University of Oxford, Thomson Reuters Foundation, George Institute of Global Health (GIGH) and adapted by IIMC in India. The course is a skill-building initiative for media professionals, and offers a unique opportunity to specialise in evidence-based reportage on public health issues.

In his message, Shri Sunil Arora, Secretary, Ministry of Information and Broadcasting said, “It is important to build skills of media professionals, especially media students, as it would have a visionary impact on reportage leading to more evidence-based coverage of crucial subjects such as public health and related development issues”

The course, currently offered to public health professionals in the UK, has been adapted for the first time in India for media professionals under the GAVI-Health System Strengthening Plan 2014-16, to create awareness around routine immunisation and child survival.

In his inaugural speech, Mr. Louis-Georges Arsenault, UNICEF Country Representative, spoke about an urgent need to work in partnership with media for highlighting critical issues of health and child survival. “Our consultations with media and journalism schools across the country gave us key insights on the need to make a valuable yet simple course which enables a scientific and evidence-based approach to reporting public health issues, especially those concerning child survival.”

On this momentous occasion, Shri K.G. Suresh, Director General, IIMC, while congratulating the students, said, “This sensitisation of media students and journalists is important and will enable them to write more substantively on public health issues. So when IIMC was chosen to do the pilot for the programme, we gladly accepted to co-create and manage this pilot project with UNICEF and with other international and national partners.”

IIMC customised and piloted the course at its campus in Delhi, over a period of three months. The students received the certificates in the presence of Dr. Pradeep Haldar, Deputy Commissioner, Immunisation, Ministry of Health and Family Welfare, Mr. Louis Georges Arsenault, UNICEF Representative to India, and Shri K.G. Suresh, Director General, IIMC.

Bearing in mind the instrumental role of media in supporting and enriching quality discourse on Public health and hence increasing acceptance of critical health initiatives, this programme has been undertaken by UNICEF, in association with the Ministry of Health and Family Welfare, and partners to promote and support a holistic environment for visibility around RI, under the Government of India’s flagship Mission Indradhanush programme.

In his address, Dr. Pradeep Haldar, Deputy Commissioner, Immunisation, Ministry of Health and Family Welfare, said, “India's Universal Immunization Programme is one of the largest immunization programmes in the world and a major public health intervention in the country. Our focus is to give maximum protection to the children against Vaccine Preventable Diseases (VPDs) through Mission Indradhanush. These life-saving vaccines will not only improve the health of our children but also reduce hospitalization and other conditions associated with VPDs among children, thereby reducing the health cost burden of the country”.

The evaluation of the programme showcased how overall more than 90% of the students found the course experience to be satisfactory and highlighted key learning which will help to make the course content more robust. Leading academicians, communication professionals, senior editors and journalists from key media groups were present at the ceremony.

In 2016, UNICEF and partners are looking to scale up the initiative by associating with media universities and schools, for taking this course forward through classroom teaching and online medium.

Note to the Editors

CASP: Critical Appraisal is a process of carefully and systematically analysing evidence to judge its trustworthiness, value and relevance in a particular context. The steps involve asking the right questions, getting the best evidence, tracking the right source of information, critically appraising the evidence and contextualizing news.

Act decisively to eliminate measles

It is a major childhood killer, and inflicts a range of complications including pneumonia, encephalitis and malnutrition

The WHO South-East Asia region is making rapid progress in the fight against vaccine-preventable diseases. The region was certified polio-free in 2014. Maternal and neonatal tetanus was routed in 2016. And routine immunisation for diseases such as diphtheria and pertussis continues to expand. More than 90 per cent of populations region-wide are now accessing the life-saving benefits vaccines bring. Health authorities now have measles in their crosshairs. Measles is a virus that can be transmitted through airdrops, personal contact and infected surfaces, and can inflict a range of deadly complications including pneumonia, diarrhoea, encephalitis and malnutrition.

Target 2020

Governments have committed to eliminating the problem by 2020. Two doses of measles-containing vaccine have now been introduced in each of the region’s 11 countries. 95 per cent coverage of both doses has been achieved in five. Where routine childhood vaccination programmes are less than ideal, supplementary immunisation drives have helped close immunity gaps. In 2015 alone around 18 million children were reached by supplementary campaigns, while an estimated 640 000 lives were saved.

There is, nevertheless, a need to scale up action. Measles is a major childhood killer, claiming an estimated 54 500 lives in 2015. Up to 5.5 million infants are deprived of even the first dose of the vaccine each year, many of whom are the most at risk of death if complications arise. Region-wide coverage of the second dose, meanwhile, is 71 per cent, signifying the need for further gains.

WHO is advocating for all of the countries to eliminate measles by 2020 — a target that is achievable. But health authorities and communities must act decisively.

To this end, strengthening routine immunisation programmes is critical. Though supplementary campaigns are useful to close immunity gaps in the short run, routine systems should be strengthened and coverage enhanced. In each of the countries the second dose should be provided to every eligible child, and communities being missed should be identified and catered for: At least 95 per cent of children region-wide should be covered by both doses of measles-containing vaccine. At the same time, in countries where most children are now covered by vaccinations, and where the disease is seen in adults, efforts should be made to achieve immunity at all ages.

Monitor and conquer

Improving surveillance and laboratory capacity is likewise essential. Though each country has, to varying degrees, implemented functional surveillance systems, not all cases are reported or laboratory confirmed. Therefore, health authorities should reinforce and expand surveillance to the community level. That’s why society-wide buy-in is important. This means encouraging health-seeking behaviour when measles-related symptoms such as fever and rash occur. It means addressing socio-cultural issues while creating greater awareness. It means establishing and maintaining political commitment at the local and national level. And it means leveraging support from international stakeholders to mobilise resources and know-how. WHO is privileged to be a part of these efforts, and to support countries as they strive to eliminate measles’ preventable burden.

The wider benefits of measles vaccination strengthening will be substantial. This is especially so for the control of rubella, a disease that affects approximately 40 000 births in the region every year, and can cause a series of conditions such as deafness and heart disease when transmitted from mother to foetus. At the start of 2017 rubella vaccine was part of a combination vaccine in eight of the 11 countries. In February, India became the ninth; in August, Indonesia will make it ten. Mass immunisation catch-up campaigns will have wide-ranging impact , and will enhance the life chances of millions of children.

As countries scale-up their campaigns, this point must stay front-of-mind. By eliminating measles, millions of children will be given the opportunity to grow and prosper where they otherwise may not have. Health systems will be strengthened, and other diseases better controlled. For the South-East Asia region, and each of the countries within it, measles elimination is a cause worth mobilising for.

The writer is Regional Director,

South-east Asia, WHO

Courtesy: Business Line